
दराज के अंधेरे कोने में जमी गर्द पर फूंक मारते ही अलसाये शब्दों ने जम्हाई लेते हुए पूछा वक्त क्या हुआ है ? यही कोई एक दोस्त को खोने जितना हुआ होगा, उदास मन बोला किंतु पुस्तक के पीछे से कोई पुराना चित्र भी दिखाई दे गया जो वक्त के कुछ और बीत जाने का आभास दे रहा था, यही पर कुछ पल असमय मर गए थे उनकी अस्थियाँ भी अब सीने से लगाने लायक नही रही तो झाडू से उनको बुहारा और एक अँधेरी सदी के मुहाने पर रखे कूड़ादान के भीतर उलट दिया। वे निशब्द अपनी नवीन यात्रा पर चल दिए हैं तो तस्वीर पर हाथ घुमाया जैसे कोई बनिया अपने उधार के खातों से किसी का प्यार वसूलना चाहता हो।
इस पहाड़ से बड़े हौसले वाले इन्सान ने जंगल में कंदराओं को, पानी में मूंगे की बस्तियों को, आसमान में फैले धूल के गुब्बार को, सूखे जंगल के अकेले पेड़ को, बुझी हुई नदी की पपडी से झांकते किसी जीव के खोल को यात्रा कर के खोजा और वहाँ शब्दों का कूड़ा करकट छोड़ आया, मेरे समय में भी घोर अकाल है एक ऐसी जगह का जहाँ शब्द न हों, जहाँ हो नितांत सूनापन, जहाँ कोई ये न पूछे की वक्त क्या हुआ है ?